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Seed the World (STW) is a nonprofit foundation. It was founded on the belief that individuals can make a difference in the global village by helping others help themselves to obtain essentials such as food, shelter and education.

धर्मबीज अक्टूबर 2018

वेद : आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष
 

हिन्दू जाति ने अपना धर्म श्रुति-वेदों से प्राप्त किया है। उसकी धारणा हैं कि वेद अनादि और अनन्त हैं। ...सम्भव है, यब बात हास्यास्पद लगे कि कोई पुस्तक अनादि और अनन्त कैसे हो सकती है। किन्तु वेदों का अर्थ कोई पुस्तक है ही नहीं। वेदों का अर्थ है, भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत मनुष्यों के पता लगने से पूर्व भी अपना काम करता चला आया था और आज यदि मनुष्य-जाति उसे भूल जाए, तो भी वह नीयम अपना काम करता ही रहेगा, ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत् का शासन करनेवाले नियमों के सम्बन्ध में भी है। एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और जीवात्मा का आत्माओं के परम पिता के साथ जो नैतिक तथा आध्यात्मिक सम्बन्ध हैं, वे उनके आविष्कार के पूर्व भी थे, और हम यदि उन्हें भूल भी जाएं, तो भी बने रहेंगे।

- स्वामी विवेकानन्द

हिन्दू धर्म पर निबंध (19 सितम्बर, 1893 को शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में स्वामीजी द्वारा पठित)


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उत्सरति इति उत्सवः (उत्सव वही जो हमें उन्नत करें)


माँ दुर्गा के नौ रूपों के पूजन का पर्व है नवरात्रि


आश्विन मास में शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नौ दिन तक चलने वाला नवरात्रि शारदीय नवरात्रि कही जाती है। शारदीय नवरात्रि में दिन छोटे होने लगते हैं और रात्रि बड़ी। कहा जाता है कि ऋतुओं के परिवर्तन काल का असर मानव जीवन पर नहीं पड़े इसीलिए साधना के बहाने ऋषि-मुनियों ने इन नौ दिनों में उपवास का विधान किया था। नवरात्रि का समापन विजयादशमी के साथ होता है।


माँ दुर्गा के नौ रूपों में पहला स्वरूप 'शैलपुत्री' के नाम से विख्यात है। कहा जाता है कि पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। दूसरे दिन माँ के दूसरे स्वरूप 'ब्रह्मचारिणी' की पूजा अर्चना की जाती है। दुर्गाजी का तीसरा स्वरूप माँ 'चंद्रघंटा' का है। चौथे दिन कूष्माण्डा देवी तथा पांचवां दिन स्कंदमाता के रूप में देवी की उपासना की जाती है। दुर्गाजी के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी और सातवें स्वरूप का नाम कालरात्रि है। मान्यता है कि सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा से ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।

दुर्गाजी की आठवें स्वरूप का नाम महागौरी है। यह मनवांछित फलदायिनी हैं। दुर्गाजी के नौवें स्वरूप का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं।भगवती दुर्गा ही सम्पूर्ण विश्व को सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। इन्हीं की शक्ति से देवता बनते हैं, जिनसे विश्व की उत्पत्ति होती है। इन्हीं की शक्ति से विष्णु और शिव प्रकट होकर विश्व का पालन और संहार करते हैं। दया, क्षमा, निद्रा, स्मृति, क्षुधा, तृष्णा, तृप्ति, श्रद्धा, भक्ति, धृति, मति, तुष्टि, पुष्टि, शांति, कांति, लज्जा आदि इन्हीं महाशक्ति की शक्तियां हैं। ये ही गोलोक में श्रीराधा, साकेत में श्रीसीता, श्रीरोदसागर में लक्ष्मी, दक्षकन्या सती, दुर्गितनाशिनी मेनकापुत्री दुर्गा हैं। ये ही वाणी, विद्या, सरस्वती, सावित्री और गायत्री हैं।
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समाज हित जीवन अर्पित

स्वदेशी आन्दोलन के प्रथम बलिदानी - बाबू गेनू

(12 दिसम्बर, बलिदान दिवस पर विशेष)

जब भी, जहां कहीं ‘स्वदेशी’ की चर्चा होती है, तब एक नवजवान का चित्र आँखों के सामने उभर कर आता है। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत युवा जब अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर हो जाता है तब वह देश के सम्मुख एक महान आदर्श छोड़ जाता है। 12 दिसम्बर, 1930 भारत के स्वदेशी आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन के रूप में स्मरणीय है। इसी दिन ‘स्वदेशी’ की प्रेरणा और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार का संदेश देते हुए बाबू गेनू ने अपना बलिदान दिया था, इसलिए आज भी इस दिन को स्वदेशी दिवस के रूप में याद किया जाता है।

एक सामान्य सा दिखने वाला युवा बाबू गेनू का जन्म पुणे जिले के महालुंगे पडवल नामक गांव में वर्ष 1908 में हुआ था। उनके पिता का नाम ज्ञानबा और माता का नाम कोंडाबाई था। गरीब किसान परिवार में जन्में गेनू का बचपन बड़ी कठिनाई में गुजरा। गेनू तब 2 वर्ष का था जब उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाई भीम ने उसके संरक्षण का भार उठाया। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से गेनू की माँ मुंबई आकर एक कपड़ा मिल में मजदूरी करने लगी। बाद में गेनू भी अपनी माँ कोंडाबाई के साथ मुम्बई में रहने लगा। जल्दी ही उन्हें उसी कपड़ा मिल में काम मिल गया, जहां उसकी माँ मजदूरी करती थीं।

उन दिनों अंग्रेज सरकार ने भारत में लूट मचा रखी थी। अंग्रेज भारत से कच्चा माल इंग्लैंड ले जाया करते और उसी माल पर प्रक्रिया कर अधिक दाम में भारत सहित दुनियाभर में बेचते। अंग्रेजों ने भारत के किसानों और मजदूरों की मेहनत से ऊपजे अन्न और वस्तुओं पर आर्थिक नीति बनाकर षड्यंत्रपूर्वक लूट का सिलसिला जारी रखा था।
अंग्रेजों की इस कुटिल चाल को विफल करने के लिए लोकमान्य तिलक ने अपनी लेखनी और प्रबोधन से ‘स्वदेशी आन्दोलन’ की प्रेरणा जगायी। उनकी प्रेरणा से स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने विदेशी सामान का बहिष्कार करने का प्रबल अभियान चलाया। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व स्वदेशी आन्दोलन ने ‘सत्याग्रह’ का रूप ले लिया और देश की अस्मिता का प्रतीक बन गया। बाबू गेनू का एक मित्र प्रल्हाद जो तत्कालीन परिस्थितियों से पूरी तरह परिचित था। वह बाबू से स्नेह रखता था और उसी ने बाबू को देश के प्रति कर्तव्य की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 1919 में हुए जलियावाले बाग के भीषण हत्याकांड के वर्णन को सुनकर बाबू का मन द्रवित हो गया। वहीं, 1928 में साइमन कमीशन को प्रतिकार करते हुए लाला लाजपतराय की हत्या का भी बाबू पर गहरा प्रभाव पड़ा। गांधीजी के प्रति उसके मन में अगाध श्रद्धा थी। वह कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता था। बाबू ने अपनी स्वतंत्रवाहिनी बनाई थी और उन्होंने तानाजी पथक का गठन किया था। कुछ धन संग्रह करके उन्होंने चरखा बनवाया। बाबू व उनके समस्त मित्रगण प्रतिदिन चरखा अवश्य काटते थे। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की मानो लहर सी चल रही थी। 26 जनवरी, 1930 को पूरे देश ने “सम्पूर्ण स्वराज्य माँग दिवस” मनाया। इस आन्दोलन में बाबू गेनू ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन के चलते बाबू को तीन माह की जेल हुई। जेल में ही उन्हें अपनी माँ के निधन का समाचार मिला। बाबू ने अपने मित्रों से कहा कि, “अब मैं पूरी तरह से मुक्त हो गया हूं, भारतमाता को मुक्त कराने के लिए कुछ भी कर सकता हूं।”

अक्टूबर, 1930 में बाबू गेनू, प्रल्हाद और शंकर के साथ जेल से बाहर आए। बाबू ने घर-घर जाकर स्वदेशी का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ कर दिया। दीपावली, 1930 के बाद विदेशी माल के बहिष्कार का आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बाबू गेनू ने अपने सभी मित्रों के साथ मिलाकर तय किया कि विदेशी वस्तुएं ले जाने वाले ट्रकों को रोकेंगे। 12 दिसम्बर को सत्याग्रह का दिन तय किया।

12 दिसम्बर, 1930 को शुक्रवार का दिन था। मुंबई के कालबा देवी इलाके में एक गोदाम विदेशी माल से भरा था। उसे दो व्यापारियों ने खरीद लिया। उन्होंने तय किया इसे लारियों से भरकर मुंबई की कोट मार्केट में ले जाएंगे। मुम्बई के मुलजी जेठा मार्केट से विदेशी कपड़े जाने थे, जिनको रोकने की जिम्मेदारी मुम्बई शहर की तत्कालीन कांग्रेस ने बाबू गेनू और उनके तानाजी पथक संगठन को सौंपी। बाबू गेनू ने विदेशी कपड़ों से भरी लॉरियां, ट्रक आदि को रोकने का निश्चय किया गया। मि. फ्रेजर को इस बात की जानकारी मिल गई।

इसलिए उसने पुलिस बल को पहले ही बुला लिया था। सुबह साढ़े दस बजे से ही सत्याग्रहियों की टोलियां जयघोष करती हुई आने लगीं। बाबू गेनू के नेतृत्व में तानाजी पथक भी आया। विदेशी माल से भरे ट्रक दौड़ने लगे। विदेशी कपड़ों से भरी हुई लॉरी आ रही थी। बाबू ने लॉरी रूकवाने का प्रयास किया। कड़े पुलिस बंदोबस्त के बावजूद घोई रेवणकर नामक युवक लॉरी के सामने लेट गया। ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और गाड़ी रुक गई। पुलिस ने खींचकर उन्हें अलग कर दिया और उनकी जमकर पिटाई की। ‘भारतमाता की जय’ और “वन्दे मातरम्” के नारों से वातावरण गूंज उठा। भीमा घोंई से तुकाराम मोहिते तक यह क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे पुलिस का गुस्सा बढ़ता गया। अब आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने बल प्रयोग प्रारम्भ कर दिया।

सत्याग्रहियों का जोर भी बढ़ रहा था। तभी लॉरी के सामने स्वयं बाबू गेनू आ गया। क्रुद्ध पुलिस का नेतृत्व कर रहे अंग्रेज सार्जेण्ट ने आदेश दिया, ‘लॉरी चलाओ, ये मर भी गया तो कोई बात नहीं।’ ड्राइवर भारतीय था उसका नाम बलवीर सिंह था। उसने लॉरी चलाने से मना कर दिया। तब अंग्रेज सार्जेण्ट ने स्वयं लॉरी चलानी प्रारम्भ कर दी। लॉरी बाबू गेनू के ऊपर से गुजर गयी। वह गम्भीर रूप से घायल हो गया। पूरी सड़क बलिदानी खून से लाल हो गई। अन्तिम सांसे ले रहे बाबू को निकट के अस्पताल में भर्ती करवाया गया जहां सायंकाल उनकी मृत्यु हो गई। बाबू की अन्तिम यात्रा के दिन पूरा मुम्बई बंद रहा।

एक अनाम मजदूर जन-जन का श्रद्धेय बन गया। बाबू की स्मृति में उनके गांव महालुंगे पडवल में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। उनकी याद में दिल्ली के आर.के.पुरम्, सेक्टर-8 और 9 के बीच के मार्ग का नाम रखा गया है। मुंबई की एक सड़क एवं देश के अनेकों संस्थानों का नामकरण भी उनके नाम से हुआ है। स्वदेशी के लिए बलिदान देने वालों में बाबू गेनू का नाम सबसे पहले आता है। प्रत्येक वर्ष 12 दिसम्बर का दिन ‘बाबू गेनू की स्मृति’ में “स्वदेशी दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

धर्मबीज प्रश्नोतरी – अक्टूबर, 2018

धर्मबीज प्रश्नोत्तरी :

यह प्रश्नोत्तरी धर्मबीज के जुलाई माह के अंक पर आधारित है। सभी प्रश्नों के सही उत्तर देनेवाले पहले तीन प्रतिभागियों को 500 रुपये मूल्य की पुस्तकें तथा स्वामी विवेकानन्द की एक प्रतिमा/चित्र पुरस्कार के रूप में दी जाएगी तथा उनके नाम और चित्र धर्मबीज के अगले अंक में प्रकाशित की जाएगी। आप अपने नाम, पते और चित्र के साथ अपने उत्तर ईमेल द्वारा : This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. को या धर्मबीज, विवेकानन्दपुरम्, कन्याकुमारी – 621702 को भेज सकते हैं।

1) “The Gift Unopened : A new American Revolution” पुस्तक की लेकिका का नाम बताइए।

2) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विवेकानन्द केन्द्र में गुरु के रूप में किसकी अर्चना की जाती है?

3) तैमूर लंग किस वीर योद्धा के भाले से मारा गाया?

4) ईशोपनिषद् में कुल कितने छंद हैं?

5) 4 जुलाई को भगिनी निवेदिता ने स्वप्न में क्या देखा?

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जुलाई, 2018 अंक की प्रश्नोत्तरी के उत्तर

1) स्वामी विवेकानन्द ने भगिनी निवेदिता को बांग्ला, हिन्दू ग्रन्थ तथा ध्यान सिखाने का दायित्व किस संन्यासी को सौंपा था?

उत्तर : स्वामी स्वरूपानन्द।

2) “उपनिषद् मानव बुद्धि की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।” यह किस जर्मन दार्शनिक का कथन है?

उत्तर : जर्मन दार्शनिक शोपेनहोवर।

3) तैमूर के विरुद्ध युद्ध में प्रधान सेनापति कौन थे?

उत्तर : वीर योद्धा जोगराज सिंह गुर्जर।

4) “नया भारत निकल पड़े...” यह सन्देश विवेकानन्द साहित्य के किस खंड में संग्रहित है?

उत्तर : विवेकानन्द साहित्य के खंड 8 में।

5) देवपाल राजा का जन्म किस गांव में हुआ, उनका सम्बन्ध किस घराने से था?

उत्तर : देवपाल राजा का जन्म मेरठ जिला के निरपड़ा गांव में एक जाट घराने में हुआ।

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सही उत्तर देनेवाले विजेता

- श्री पाल खोजा

विवेकानन्द केन्द्र, भजनगंज, नई बस्ती, अजमेर
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धर्मकथा


भगिनी निवेदिता : जिसने अपना सर्वस्व भारत को दे दिया

 

गतांक : स्वामी विवेकानन्द की महासमाधि के उपरांत भगिनी निवेदिता ने महसूस किया कि शोक मनाने का समय भी शेष नहीं है। उन्होंने कहा, “स्वामीजी अब हम सभी लोगों के माध्यम से कार्य करेंगे क्योंकि एक शरीर से कार्य करने की उनकी बाध्यता नहीं है।” इस प्रकार मात्र 9 वर्षों में उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र को योगदान देते हुए  विभिन्न राष्ट्र निर्माण के कार्यों में झोंक दिया। 

 

निवेदिता ने स्वामीजी के भारत के प्रति अथाह प्रेम को समझ लिया था। उन्होंने स्वामीजी के सन्देश – भारत की राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने की आवश्यकता है- के मूल को आत्मसात कर लिया था। लगातार हुए आक्रमणों के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हिन्दू समाज, राष्ट्र की व्यापक दृष्टि को खो चुका था। राष्ट्र की तमाम बुराइयों की जड़ यही थी। निवेदिता ने इस कार्य के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में उनका ध्येय उसे राष्ट्रोन्मुखी करना था। उनका ध्येय ऐसी संस्थाओं तथा प्रथाओं का निर्माण करना था जिसमें राष्ट्र को प्राथमिकता मिले, जहां राष्ट्रीय प्रतिभा एवं आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिले।

उनके जीवन की हर छोटी घटना भी भारत के प्रति उनके प्रेम को दर्शाती थी। 1903 के गर्मी के दिनों में निवेदिता मेदिनीपुर आ रही थीं। रेल्वे स्टेशन पर कई लोग उनका अभिवादन करने के लिए एकत्रित थे। जिस क्षण वे ट्रेन से उतरीं, भीड़ ने हिप-हिप हुर्रे का नारा लगाया। उन्होंने (लोगों) ने सोचा कि गोरी चमड़ी की महिला का उस रूप में अभिवादन अच्छा होगा। पर निवेदिता अत्यंत दुखी दिखाई पड़ीं। उन्होंने अपने हाथों से उन्हें (भीड़ को) रुकने के लिए कहा। फिर उन्होंने समझाया कि ‘हिप-हिप हुर्रे’ अंग्रेजों का विजय चिन्ह था और भारतीयों को किसी भी रूप में उसका उपयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने (निवेदिता ने) अपना हाथ ऊपर किया और तीन बार ‘वाहे गुरूजी का खालसा वाहे गुरूजी की फतह’ का उद्घोष किया। पूरी भीड़ ने इसमें उनका साथ दिया।



किसी देश के प्रति प्रेम का अर्थ उसकी युग-प्राचीन परम्पराओं के साथ रहने का धैर्य। अधीर नहीं होना बल्कि इस बात की धैर्य के साथ प्रतीक्षा करना कि लोग समय की मांग के अनुसार तैयार हों। निवेदिता ने कभी परम्पराओं की आलोचना नहीं की। विदेशी होने के कारण कुछ विद्यार्थी उनके हाथ से खाना नहीं लेते थे। पर प्राण से प्यारे इन विद्यार्थियों के इस स्वाभाव ने उन्हें कभी आघात नहीं पहुंचाया। बल्कि सामाजिक नियमों के प्रति उनकी (विद्यार्थियों की) निष्ठा का वे आदर करती रहीं। उन्होंने लोगों की भावनाओं को कभी आघात या भारतीयों की पारम्परिक सामजिक प्रथाओं एवं संस्कारों को क्षति नहीं पहुंचानी चाही।

एक दिन भगिनी निवेदिता ने एक नाव किराये पर ली और अपने विद्यार्थियों को दक्षिणेश्वर मंदिर ले गईं। नाव से उतरने के बाद वह सर्वप्रथम श्री रामकृष्ण के कक्ष में पहुंची और दूसरों के साथ ध्यान में लम्बा समय बिताया। फिर वे बालिकाओं को भवतारिणी ले गईं। सारी बालिकाओं ने मंदिर में प्रवेश कर माँ काली को प्रणाम किया। पर निवेदिता को मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। अतः वे गंगा नदी के किनारे चांदनी में चलते-चलते नटमंदिर के अंतिम हिस्से में पहुँच गई। वहां खड़ी होकर उन्होंने माँ काली को देखा। निवेदिता के इस प्रकार माँ काली के दर्शन करने से बालिकाएं बहुत दुखी हुईं। पर निवेदिता विचलित नहीं थीं। वहां से भी माँ के दर्शन पाकर वह आनंद से भरी हुई थीं।

निवेदिता के लिए भारत एक पवित्र भूमि थी। उनकी अनुभूति में यहाँ का हर व्यक्ति पवित्र था। एक दिन उनके ग्वाले ने जो उन्हें रोज दूध दिया करता था, उनसे धर्म के बारे में कुछ बोलने के लिए कहा। इस पर निवेदिता ने संकोच अनुभव किया। उन्होंने उसका बार-बार अभिवादन किया और कहा, “आप भारतीय हो। मैं आपको क्या सलाह दूँ? ऐसा क्या है जो आप नहीं जानते हो? आप श्री कृष्ण के वंशज हो। मैं आपको एक बार पुनः प्रणाम करती हूँ।”

भारत के प्रति निवेदिता का गहरा प्रेम जीवन के हर क्षेत्र में- राजनीति, शिक्षा, साहित्य, समाजशास्त्र, आध्यात्मिकता आदि सबमें प्रगट होता था। एक अध्यात्मिक व्यक्ति बहुआयामी होता है। भगिनी निवेदिता भी ऐसी ही थीं। वह एक क्रांतिकारी थीं जिसने क्रांतिकारियों के क्रिया-कलापों को सक्रिय रूप में साथ दिया और उनका संयोजन किया। वह एक योगिनी भी थीं। इसी कारण श्री अरविन्द उनको अग्निशिखा कहते थे। वह एक शिक्षाविद् थीं और उन्होंने कुछ शैक्षिक संस्थाओं को प्रारंभ किया। उन्होंने युवा कलाकारों को कला के माध्यम से भारत की आत्मा को प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित किया। वे उनको महाश्वेता के रूप में देखते थे। वह एक लेखिका थीं जिसने 20 पत्रिकाओं में नियमित रूप से योगदान दिया और कई पुस्तकें भी लिखीं। वह किसी भी आपदा में लोगों की सेवा करने वालों में प्रथम हुआ करती थी- चाहे वह सूखा हो, बाढ़ हो, प्लेग हो या काराबंदी क्रांतिकारियों के अनाथ परिवार हों। वह एक साथ श्री शारदा माता के चरणों में बालिका थीं, एक लोकमाता थीं जैसा कि रवीन्द्र नाथ टैगोर कहा करते थे, और सर्वोपरि सबकी भगिनी थीं।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “ओ परम भाग्यशाली ! मेरा विश्वास है कि भारत पुनः जागृत होगा अगर कोई अपने सम्पूर्ण हृदय से देश के समृद्धि सौभाग्य से रहित, दबे, कुचले, भूखे, झगडालू एवं ईर्ष्यालु लोगों को प्यार करे” भगिनी निवेदिता वह परम भाग्यशाली व्यक्ति थीं। वह भारत एवं भारतीयों को उनके तमाम दोषों के होते हुए भी प्यार करती थीं। उन्होंने राष्ट्रीय जीवन में स्वयं को उड़ेल दिया था।

यह उन सभी के लिए प्रेरणा है जो राष्ट्र निर्माण के लिए काम करना चाहते हैं कि निवेदिता ने भारतमाता की सेवा का सही साधन बनने के लिए स्वयं को कैसे परिवर्तित कर लिया। उनके जीवन का मुख्या मुद्दा भारत था। उनके (निवेदित के) मित्र और विरोधी इस बात से निश्चित होते थे कि उनका भारत के लिए समर्थन है या नहीं। उन्होंने जो भी किया उनका प्रयास सदैव भारत की आत्मा और राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति रहा। यह उनसे ली जानेवाली दूसरी प्रेरणा है कि हमारे हर कार्य में राष्ट्रीयता- भारतीयता अभिव्यक्त हो। भारत आने के बाद निवेदिता मुश्किल से 14 वर्ष जीवित रहीं। पर उनके द्वारा किया गया कार्य अनंत है क्योंकि उन्होंने स्वयं को पूर्ण समर्पित कर दिया था। उनके जीवन का क्षणार्ध भी अपने लिए व्यय नहीं हुआ। इसलिए जब उनका 1911 में दार्जिलिंग में देहावसान हुआ तो उनकी समाधि पर भारतीयों द्वारा लिखा गया, - “यहां भगिनी निवेदिता विश्राम कर रहीं हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत को दे दिया।” उनका जीवन हम सबको अपनी मातृभूमि और अपने लोगों को प्रेम करने तथा भारतमाता के लिए कार्य करने के योग्य बनाए।

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हिन्दू धर्मशास्त्र (अपने धर्म ग्रंथों को जानें)

केनोपनिषद्

सामवेदीय 'तलवकार ब्राह्मण' के नौवें अध्याय में केनोपनिषद् का उल्लेख है। इसमें आरम्भ से लेकर अन्तपर्यन्त सर्वप्रेरक प्रभु के ही स्वरूप और प्रभाव का वर्णन किया गया है। इस उपनिषद् में 'केन' (किसके द्वारा) का विवेचन होने से इसे 'केनोपनिषद्' कहा गया है। इसके चार खण्ड हैं। प्रथम और द्वितीय खण्ड में गुरु-शिष्य की संवाद-परम्परा द्वारा उस (केन) प्रेरक सत्ता की विशेषताओं, उसकी गूढ़ अनुभूतियों आदि पर प्रकाश डाला गया है। तीसरे और चौथे खण्ड में देवताओं में अभिमान तथा उसके मान-मर्दन के लिए 'यज्ञ-रूप' में ब्राह्म-चेतना के प्रकट होने का उपाख्यान है। अन्त में उमा देवी द्वारा प्रकट होकर देवों के लिए 'ब्रह्मतत्त्व' का उल्लेख किया गया है तथा ब्रह्म की उपासना का ढंग समझाया गया है। मनुष्य को 'श्रेय' मार्ग की ओर प्रेरित करना, इस उपनिषद का लक्ष्य हैं। इसकी वर्णन शैली बड़ी ही उदात्त और गम्भीर है। मन्त्रों के पाठमात्र से ही हृदय एक अपूर्व आनंद का अनुभव करने लगता है। भगवती श्रुति की महिमा अथवा वर्णन शैली के सम्बन्ध में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाना है।

1) वह कौन है?


प्रथम खण्ड में 'ब्रह्म-चेतना' के प्रति शिष्य अपने गुरु के सम्मुख अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है। वह अपने मुख से प्रश्न करता है कि वह कौन है, जो हमें परमात्मा के विविध रहस्यों को जानने के लिए प्रेरित करता है? ज्ञान-विज्ञान तथा हमारी आत्मा का संचालन करने वाला वह कौन है? वह कौन है, जो हमारी वाणी में, कानों में और नेत्रों में निवास करता है और हमें बोलने, सुनने तथा देखने की शक्ति प्रदान करता है?

शिष्य के प्रश्नों का उत्तर देते हुए गुरु बताते हैं कि जो साधक मन, प्राण, वाणी, आँख, कान आदि में चेतना-शक्ति भरने वाले 'ब्रह्म' को जान लेता है, वह जीवन्मुक्त होकर अमर हो जाता है तथा आवागमन के चक्र से छूट जाता है।

वह महान् चेतनतत्त्व (ब्रह्म) वाक् का भी वाक् है, प्राण-शक्ति का भी प्राण है, वह हमारे जीवन का आधार है, वह चक्षु का भी चक्षु है, वह सर्वशक्तिमान है और श्रवण-शक्ति का भी मूल आधार है। हमारा मन उसी की महत्ता से मनन कर पाता है। उसे ही 'ब्रह्म' समझना चाहिए। उसे आँखों से न तो देखा जा सकता है और न ही कानों से उसे सुना जा सकता है।

2) वह सर्वज्ञ है

इस खण्ड में 'ब्रह्म' की अज्ञेयता और मानव-जीवन के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। गुरु शिष्य को बताते हैं कि जो असीम और अनन्त है, उसे वह भली प्रकार से जानता है या वह उसे जान गया है, ऐसा नहीं है। उसे पूर्ण रूप से जान पाना असम्भव है। हम उसे जानते हैं या नहीं जानते हैं, ये दोनों ही कथन अपूर्ण हैं।

अहंकारविहीन व्यक्ति का वह बोध, जिसके द्वारा वह ज्ञान प्राप्त करता है, उसी से वह अमृत-स्वरूप 'परब्रह्म' को अनुभव कर पाता है। जिसने अपने जीवन में ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लिया, उसे ही परब्रह्म का अनुभव हो पाता है। किसी अन्य योनि में जन्म लेकर वह ऐसा नहीं कर पाता। अन्य समस्त योनियां, कर्म-भोग की योनियां हैं। मानव-जीवन में ही बुद्धिमान पुरुष प्रत्येक वाणी, प्रत्येक तत्त्व तथा प्रत्येक जीव में उस परमात्मसत्ता को व्याप्त जानकर इस लोक में जाता है और अमरत्व को प्राप्त करता है।

3) वह अहंकार से परे है

तीसरे खण्ड में देवताओं के अहंकार का मर्दन किया गया है। एक बार उस ब्रह्म ने देवताओं को माध्यम बनाकर असुरों पर विजय प्राप्त की। इस विजय से देवताओं को अभिमान हो गया कि असुरों पर विजय प्राप्त करनेवाले वे स्वयं हैं। इसमें 'ब्रह्म' ने क्या किया?

तब ब्रह्म ने उन देवताओं के अहंकार को जानकर उनके सम्मुख यक्ष के रूप में अपने को प्रकट किया। तब देवताओं ने जानना चाहा कि वह यक्ष कौन है?

सबसे पहले अग्निदेव ने जाकर यक्ष से उसका परिचय पूछा। यक्ष ने अग्निदेव से उनका परिचय पूछा, - “आप कौन हैं?” अग्निदेव ने उत्तर दिया कि वह अग्नि है और लोग उसे जातवेदा कहते हैं। वह चाहे, तो इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे भस्म कर सकता है, जला सकता है।

तब यक्ष ने एक तिनका अग्निदेव के सम्मुख रखकर कहा- “आप इसे जला दीजिए।”

अग्निदेव ने बहुत प्रयत्न किया, पर वे उस तिनके को जला नहीं सके। हारकर उन्होंने अन्य देवों के पास लौटकर कहा कि वे उस यक्ष को नहीं जान सके।

उसके बाद वायु देव ने जाकर अपना परिचय दिया और अपनी शक्ति का बढ़-चढ़कर बखान किया। इस पर यक्ष ने वायु से कहा कि वे इस तिनके को उड़ा दें, परन्तु अपनी सारी शक्ति लगाने पर भी वायुदेव उस तिनके को उड़ा नहीं सके। तब वायुदेव ने इन्द्र के समक्ष लौटकर कहा कि वे उस यक्ष को समझने में असमर्थ रहे। उन्होंने इन्द्र से पता लगाने के लिए कहा।

इन्द्र ने यक्ष का पता लगाने के लिए तीव्रगति से यक्ष की ओर प्रयाण किया, परन्तु उसके वहां पहुंचने से पहले ही यक्ष अन्तर्धान हो गए। तब इन्द्र ने भगवती उमा से यक्ष के बारे में प्रश्न किया कि यह यक्ष कौन था?

4) वही ब्रह्म है

इन्द्र के प्रश्न को सुनकर उमादेवी ने कहा, - “हे देवराज! समस्त देवों में अग्नि, वायु और स्वयं आप श्रेष्ठ माने जाते हैं; क्योंकि ब्रह्म को शक्ति-रूप में इन्हीं तीन देवों ने सर्वप्रथम समझा था और ब्रह्म का साक्षात्कार किया था। यह यक्ष वही ब्रह्म था। ब्रह्म की विजय ही समस्त देवों की विजय है।”

इन्द्र के सम्मुख यक्ष का अन्तर्धान होना, ब्रह्म की उपस्थिति का संकेत- बिजली के चमकने और झपकने- जैसा है। इसे सूक्ष्म दैविक संकेत समझना चाहिए। मन जब 'ब्रह्म' के निकट होने का संकल्प करके ब्रह्म-प्राप्ति का अनुभव करता हुआ-सा प्रतीत हो, तब वह ब्रह्म की उपस्थिति का सूक्ष्म संकेत होता है।

जो व्यक्ति ब्रह्म के 'रस स्वरूप' का बोध करता है, उसे ही आत्मतत्त्व की प्राप्ति हो पाती है। तपस्या, मन और इन्द्रियों का नियन्त्रण तथा आसक्ति रहित श्रेष्ठ कर्म, ये ब्रह्मविद्या-प्राप्ति के आधार हैं। वेदों में इस विद्या का सविस्तार वर्णन है। इस ब्रह्मविद्या को जानने वाला साधक अपने समस्त पापों को नष्ट हुआ मानकर उस अविनाशी, असीम और परमधाम को प्राप्त कर लेता है। तब इन्द्र को यक्ष के तात्विक स्वरूप का बोध हुआ और उन्होंने अपने अहंकार का त्याग किया।

अन्त में ब्रह्मवेत्ता जिज्ञासु शिष्यों को बताते हैं कि इस उपनिषद् द्वारा तुम्हें ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है। इस पर चलकर तुम ब्रह्म के निकट पहुंच सकते हो।


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धर्मबीज जनवरी 2019
COLONIAlIZAM 2.0
 

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Tuesday, 21 May 2019